शाहजहाँ और ताजमहल - प्यार या पछतावा?
आगरा के ताजमहल को दुनिया प्यार की निशानी कहती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पीछे एक दर्द भरी कहानी भी है?
शाहजहाँ अपनी बेगम मुमताज महल से बहुत प्यार करता था। 1631 में मुमताज की 14वें बच्चे को जन्म देते समय मृत्यु हो गई। मरते समय मुमताज ने शाहजहाँ से दो वादे लिए थे।
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शाहजहाँ ने दूसरा वादा पूरा करने के लिए 1632 में ताजमहल बनवाना शुरू किया। 20,000 मजदूरों ने 22 साल तक दिन-रात काम किया। सफेद संगमरमर राजस्थान से, जेड चीन से और नीलम श्रीलंका से मंगवाया गया।
जब ताजमहल बनकर तैयार हुआ, तो शाहजहाँ ने सोचा - अब यमुना के दूसरी तरफ अपने लिए काले संगमरमर का ताजमहल बनवाऊंगा। लेकिन तभी उसके बेटे औरंगजेब ने उसे आगरा के किले में कैद कर दिया।
शाहजहाँ ने अपने जीवन के आखिरी 8 साल आगरा किले की एक छोटी सी खिड़की से ताजमहल को देखते हुए बिताए। वह खिड़की से ही अपनी मुमताज को याद करता रहता था।
1666 में उसी किले में उसकी मृत्यु हो गई और उसे भी ताजमहल में मुमताज के बगल में दफना दिया गया।